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सफाई ठेके के नाम पर करोड़ों का गोलमाल! – जिस फर्म ने दोगुने रेट पर लिया था 22 वार्डों का ठेका, अब वही फर्म आधे रेट पर ठेका लेने पर राजी – सफाई वाली फाइल पर टिप्पणी कर डीएलबी ने फिर डाली गेंद सभापति के पाले में

श्रीगंगानगर। छोटे से लेकर बड़ी बात तक हर मुद्दे पर अखबारों की सुर्खियां बना रहने वाला विभाग नगर परिषद इस बार भी सफाई ठेके को लेकर काफी चर्चा में है। पिछला सफाई ठेका निरस्त होने के बाद अब जो नया सफाई ठेका हुआ है, इन दोनों में आ रहे दिन-रात के अंतर से पता चलता है कि सफाई की आड़ में कुछ लोग कितनी अंधाधुंध कमाई कर रहे हैं? जिस फर्म को नगरपरिषद ने पिछली बार 6.20 करोड़ सलाना सफाई का ठेका दिया था। अब वही फर्म इससे भी आधे रेट यानि करीब साढ़े तीन करोड़ में ही सफाई करवाने को तैयार है। दोनों ठेकों में इतनी बड़ी राशि का अंतर देखकर ही पता लगाया जा सकता है कि इस मामले में कितना बड़ा गेम खेला जा रहा है?
पिछले साल नगरपरिषद की ओर से 16 वार्डों की सफाई का ठेका 2.20 करोड़ सलाना में हरियाणा की शिवा कंस्ट्रक्शन कम्पनी नाम की फर्म को दिया गया था। इस साल वार्डों की संख्या बढ़ाकर 22 कर दी, यानि 4 वार्ड और जोड़ दिए। इस ठेके को नगरपरिषद द्वारा हरियाणा की इसी फर्म को 6.20 करोड़ में दिया गया। मात्र चार वार्डों पर करीब चार करोड़ की राशि का अंतर आने पर कुछ पार्षदों ने ऐतराज जताते हुए इसकी शिकायत डीएलबी से कर दी। डीएलबी ने जांच पड़ताल के बाद इस ठेके को निरस्त कर नगरपरिषद को नए सिरे से ठेका करने के निर्देश दिए। नगर परिषद अधिकारियों ने इन्हीं आदेशों की पालना करते हुए करीब एक पखवाड़ा पहले सफाई ठेके के नए सिरे से ऑनलाइन टेण्डर जारी किए, जिसमें कई ठेकेदारों ने भाग लिया। हैरानी की बात तो यह है कि इस बार भी नगर परिषद ने इसी पुराने ठेकेदार यानि हरियाणा की शिवा कंस्ट्रक्शन कम्पनी को ही ठेका देने का मन बनाया। निविदा में जिन चार ठेकेदारों ने राशि भरी थी, उनमें से सबसे कम राशि यानि 3.88 करोड़ इसी ठेकेदार ने भरी। हैरानी की बात तो यह है कि जिन चार ठेकेदारों ने राशि भरी, उनमें करीब पांच-पांच हजार का ही अंतर था। इस अंतर को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस ऑनलाइन टेण्डर भी पूल बनाकर ठेकेदार को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। खैर, इसी फर्म को 3.88 करोड़ सलाना में सफाई का ठेका देने की वकालत नगर परिषद अधिकारियों द्वारा की गई। कागजों में नगर परिषद अधिकारी भी अपनी जगह ठीक थे, क्योंकि सबसे कम रेट ही इसी फर्म के थे।
पिछली बार से आधे में कैसे राजी?
यह वही फर्म है, जिसने पिछला विवादित सफाई ठेका (जो पार्षदों की शिकायत पर डीएलबी ने कैंसिल कर दिया) 6.20 करोड़ में लिया था, यानि तब ठेकेदार को लग रहा था कि उसे 6.20 करोड़ रुपए मिलने पर ही 22 वार्डों में सफाई का कार्य करवा सकता है, लेकिन अब वही ठेकेदार उतने ही वार्डों में उतने ही सफाई कर्मचारियों द्वारा 3.88 करोड़ रुपए से काम करवाने को आखिर राजी क्यों हो गया। यह एक जांच का विषय है। राशि में इतना बड़ा अंतर देखकर हर कोई चक्कर खा जाता है, लेकिन यह नगर परिषद है यहां कुछ भी हो सकता है।
डीलएलबी ने वापिस भेजी फाइल
पिछले दिनों यह फाइल सभापति ने वित्तीय अनुमोदन के लिए डीएलबी को भेजी थी। डीएलबी के अधिकारियों ने ठेके वाली इस फाइल का वित्तीय अनुमोदन कर जांच कर ली है, जिसमें पूरी फाइल पर डीएलबी अधिकारियों ने संतोष जताया है, हालांकि डीएलबी की ओर से कहीं भी इस ठेके को ओके कर कार्य आदेश जारी करने के आदेश नहीं दिए गए। डीएलबी की ओर से की गई टिप्पणी में यही कहा गया है कि वार्डों की जनसंख्या के आधार पर ठेकेदार की ओर से लगाए जाने वाले कर्मचारियों की संख्या सही है, अब यह ठेका ठेकेदार को देना है या नहीं, इसका फैसला नगर परिषद बोर्ड ही करने में सक्षम है। यानि डीएलबी के अधिकारियों ने ठेके वाली फाइल फिर से चेयरमैन के पाले में डाल दी है।
क्या है ‘पूल’ का खेल?
‘पूल’ वह खेल है जिसमें शामिल होने वाले ठेकेदारों की तो चांदी होती है, लेकिन संबंधित विभाग को हजारों, लाखों का फटका लगता है। मान लीजिए सफाई ठेके के लिए चार फर्मों ने निविदा में भाग लिया। ये चारों ठेकेदार एक तय स्थान पर इकट्ठे होकर तय करते हैं कि ठेका कौन लेने का इच्छुक है? इसके दो तरीके हैं पहला तो जितने का ठेका उस हिसाब से प्रतिशत राशि की बोली और दूसरा है पर्ची सिस्टम। मान लीजिए एक लाख रुपए का ठेका है तो जो ठेकेदार एक लाख का सबसे अधिक प्रतिशत बाकी तीन ठेेकेदारों को देने के लिए सहमत होगा, चारों टेंडर कॉपियों में रेट उसी ठेकेदार के हिसाब से भरे जाएंगे। जैसे 10 प्रतिशत पर बोली छूटी तो एक लाख का 10 प्रतिशत 10 हजार रुपए हुआ। ये 10 हजार रुपए तीन ठेकेदारों मेें बराबर बांटे जाएंगे और अधिक बोली देने वाला चौथा ठेकेदार तीनों ठेकेदार से मन मुताबिक रेट भरवा कर ठेका खुद ले लेगा। दूसरा सिस्टम पर्ची वाला है, इसमें प्रतिशत राशि की बोली तो नहीं होती, लेकिन ठेका राशि का प्रतिशत तय कर लिया जाता है। जैसे एक लाख रुपए का 10 प्रतिशत देना तय हुआ। जिस ठेकेदार के नाम की पर्ची निकलती है, वह तय प्रतिशत राशि शेष ठेकेदारों में बराबर बांट देगा और अपने रेट से ठेका ले लेगा। विभाग को नुकसान यह होता है कि ठेकेदारों में प्रतिस्पद्र्धा होती तो एक लाख वाला काम 50 हजार में भी हो जाता, लेकिन पूल बन जाने से पूल में अव्वल रहा ठेकेदार अपने मन मुताबिक रेट भरता है जिससे एक लाख के काम का ठेका डेढ़ से दो लाख तक भी पहुंच जाता है। पूल में शामिल होने वाली अधिकतर फर्में काम लेने की इच्छुक नहीं होती हैं। ऐसे ठेकेदार भाग लेकर पूल राशि लेकर शांत हो जाते हैं और बड़ी फर्मों के ठेकेदार इस खेल का पूरा फायदा उठाते हैं। कुल मिलाकर पूल की राशि देने वाला ठेकेदार मन मुताबिक रेट भरकर पूल में शामिल ठेकेदारों में बांटी गई रकम संबंधित विभाग से ही वसूल करता है।

Amit Khan
I am a enthusiastic journalist and work for day and night to aware people about new events and local problems about your city and state.

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